किसकी मर्जी
आखिर क्यों हर रोज खुद को इतनी तख़लीफ़ में देता
आखिर क्यों होठों से मुस्कान आखों से चुपके आंसू बहाता
आखिर किसकी है ये मर्जी
आखिर क्यों औरों तरह में नहीं रोता
क्यों रिश्तों के लिए इतना है में सहता
आखिर किसकी है ये मर्जी
आखिर क्यों में अपने सपनो को सहमे सहमे पूरा करने की कोसिस करता
क्यों कहर बनकर खुदा भी मुझपर ही बरसता
आखिर किसकी है ये मर्जी
अपनों के ताने सुनकर भी क्यों जबरन में मुस्कुराता
आखिर क्यों अपने अनोखे अंदाज में दर्दो को आसूं बना में बहाता
क्या ये मर्जी है मेरी या यही मर्जी है मेरे अपनों की lllllll
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