अब सूरज है ढलने को हो चली है शाम

"अब सूरज है ढलने को हो चली है शाम"
नव से कितने हो रही है गायब 
अंधेरों का छा रहा साम्राज्य
अब सूरज है ढलने को हो चली है शाम ।
क्यों यूं तू खड़ा ,
 क्यों हारने को है तुला 
चल आगे बढ़ वक़्त हो चला है खत्म 
अब सूरज है ढलने को हो चली है शाम ।
क्यों यूं तू मायूस सा बैठा है ,
 क्यों चांद पर लगा रहा दाग,
चल उठ खड़ा हो जिंदगी को दे एक नई उड़ान 
अब सूरज है ढलने को हो चली है शाम ।
क्यों यूं तू हार का ग़म मना रहा 
क्यों यूं तू मन ही मन जिंदगी से कतरा रहा, 
चल उठ दे अपनी हार को जीत का नया इनाम 
अब सूरज है ढलने को हो चली है शाम ।
क्यों है यूं तू शोक के सागर में डूबा 
क्यों है तू यूं डर का बना गुलाम 
लहरा दे इस जहां में अपने जीत का तरंग 
दे दे इस जहां को एक नया पैगाम
अब सूरज है ढलने को हो चली है शाम ।।
                        - N.kumar


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