"मनाऊं कैसे "
तुम जो रूठ जाती हो इस कदर मनाऊं कैसे
दायरा है मेरा उसे पार कर तुम्हें समझाऊं कैसे
हर दिन मेरी कोशिस रहती है तेरी वक़्त से अनबन ना हो
पर ये बात वक़्त को समझाऊं कैसे
तेरा लड़ना मुझसे, झगड़ना मुझसे जैसे कोई अपना
पर इस छोटे से सफर को अपना कह जताऊं कैसे
कभी कभी तेरी नादानियों पर खिलखिला कर हसने का दिल करता
पर बता ये दायरा तेरे रहते मुस्कुराऊँ कैसे
इतना जो गुस्साती हो
बताओ तेरे गुस्से की कहर से खुद को बचाऊं कैसे
कुछ दायरे है मेरे तेरे साथ
तो बताओ इससे अधिक तेरे छवि को शब्दों में पिरोऊँ कैसे
तुम जो रूठ जाती हो इस कदर मनाऊं कैसे
दायरा है मेरा उसे पार कर समझाऊ कैसे lllll
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